❤❤❤❤❤❤❤❤❤❤❤❤❤❤❤ #प्यार के ऐसास को #जुंवा की ज़रुरत #नही होती #इंकार नजरो मै हो #तो #वहज़ पता# नही होती ☀️☀️☀️☀️☀️☀️☀️☀️☀️☀️☀️☀️☀️☀️☀️☀️☀️☀️☀️☀️ !!काश:ये एहसास मुझको पहले हो जाता!! !! तेरे बिछड़ने के गम को मैं महसूस क र पाता!! !! मैं छोड़ता उस आईने को जिसमे # था तेरा दीदार रोज होता!! !! ना तुझे भूल पाते हैं ना वो लम्हा भूल पाते हैं!! !! जो वक्त था हम दोनों ने एक साथ था गुजारा!! !! काश एहसास मुझे पहले हो जाता.!! !! तेरी तो पता नहीं अपनी पता है!! !! कि तुझसे दूर जाने के बाद!! !! जी रहे हैं ऐसे जैसे जिस्म से सांस निकल जाने के बाद!! !! काश एहसास मुझको पहले हो जाता!! !! तेरे बिछड़ने के गम को मैं महसूस कर पाता!!…..स्नेह 🍁🍁

फिर वहीं लौट के जाना होगा यार ने कैसी रिहाई दी है यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं सोंधी सोंधी लगती है तब माज़ी की रुस्वाई भी रात गुज़रते शायद थोड़ा वक़्त लगे धूप उन्डेलो थोड़ी सी पैमाने में हम ने अक्सर तुम्हारी राहों में रुक कर अपना ही इंतिज़ार किया वो उम्र कम कर रहा था मेरी मैं साल अपने बढ़ा रहा था … .स्नेह 🍁🍁

वे लमहे कितने दिलकश थे वे घड़ियाँ कितनी प्यारी थीं, वे सहरे कितने नाज़ुक थे वे लड़ियाँ कितनी प्यारी थीं बस्ती को हर-एक शादाब गली, रुवाबों का जज़ीरा थी गोया हर मौजे-नफ़स, हर मौजे सबा, नग़्मों का ज़खीरा थी गोया नागाह लहकते खेतों से टापों की सदायें आने लगीं बारूद की बोझल बू लेकर पच्छम से हवायें आने लगीं तामीर के रोशन चेहरे पर तखरीब का बादल फैल गया हर गाँव में वहशत नाच उठी, हर शहर में जंगल फैल गया मग़रिब के मुहज़्ज़ब मुल्कों से कुछ खाकी वर्दी-पोश आये इठलाते हुए मग़रूर आये, लहराते हुए मदहोश आये खामोश ज़मीं के सीने में, खैमों की तनाबें गड़ने लगीं मक्खन-सी मुलायम राहों पर बूटों की खराशें पड़ने लगीं फौजों के भयानक बैंड तले चर्खों की सदायें डूब गईं जीपों की सुलगती धूल तले फूलों की क़बायें डूब गईं इनसान की कीमत गिरने लगी, अजनास के भाओ चढ़ने लगे चौपाल की रौनक घटने लगी, भरती के दफ़ातर बढ़ने लगे बस्ती के सजीले शोख जवाँ, बन-बन के सिपाही जाने लगे जिस राह से कम ही लौट सके उस राह पे राही जाने लगे इन जाने वाले दस्तों में ग़ैरत भी गई, बरनाई भी माओं के जवां बेटे भी गये बहनों के चहेते भाई भी बस्ती पे उदासी छाने लगी, मेलों की बहारें ख़त्म हुई आमों की लचकती शाखों से झूलों की कतारें ख़त्म हुई धूल उड़ने लगी बाज़ारों में, भूख उगने लगी खलियानों में हर चीज़ दुकानों से उठकर, रूपोश हुई तहखानों में बदहाल घरों की बदहाली, बढ़ते-बढ़ते जंजाल बनी महँगाई बढ़कर काल बनी, सारी बस्ती कंगाल बनी चरवाहियाँ रस्ता भूल गईं, पनहारियाँ पनघट छोड़ गईं कितनी ही कंवारी अबलायें, माँ-बाप की चौखट छोड़ गईं इफ़लास-ज़दा दहकानों के हल-बैल बिके, खलियान बिके जीने की तमन्ना के हाथों, जीने ही के सब सामान बिके कुछ भी न रहा जब बिकने को जिस्मों की तिजारत होने लगी ख़लवत में भी जो ममनूअ थी वह जलवत में जसारत होने लगी   तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं…..स्नेह 🍁🍁

 अपनी पुस्तकें संकलन हेतु भेजें    परछाइयाँ (गजल) / साहिर लुधियानवी  साहिर लुधियानवी » परछाईयाँ (संग्रह) »  Script  जवान रात के सीने पे दूधिया आँचल मचल रहा है किसी ख्वाबे-मरमरीं की तरह हसीन फूल, हसीं पत्तियाँ, हसीं शाखें लचक रही हैं किसी जिस्मे-नाज़नीं की तरह फ़िज़ा में घुल से गए हैं उफ़क के नर्म खुतूत ज़मीं हसीन है, ख्वाबों की सरज़मीं की तरह   तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरतीं हैं कभी गुमान की सूरत कभी यकीं की तरह वे पेड़ जिन के तले हम पनाह लेते थे खड़े हैं आज भी साकित किसी अमीं की तरह इन्हीं के साए में फिर आज दो धड़कते दिल खामोश होठों से कुछ कहने-सुनने आए हैं न जाने कितनी कशाकश से कितनी काविश से ये सोते-जागते लमहे चुराके लाए हैं यही फ़िज़ा थी, यही रुत, यही ज़माना था यहीं से हमने मुहब्बत की इब्तिदा की थी धड़कते दिल से लरज़ती हुई निगाहों से हुजूरे-ग़ैब में नन्हीं सी इल्तिजा की थी कि आरज़ू के कंवल खिल के फूल हो जायें दिलो-नज़र की दुआयें कबूल हो जायें   तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं …..स्नेह 🍁🍁

#भुला कर हमें क्या #वो खुश रह #पाएंगे #साथ में नही तो# मेरे जाने के #बाद मुस्कुरायेंगे #दुआ है #खुदा से की उन्हें #कभी दर्द न देना #हम तो सह #गए पर वो #टूट जायेंगे ********************************** Good evening friends ❤❤❤

सारी उम्र.. यु ही गुजर गई रिश्तो की तुरपाई में….! कुछ रिश्ते पक्के निकले… बाकी उधड गए.. कच्ची सिलाई में.. बडा मुश्किल काम दे दिया किस्मत ने मुझको….. कहती है….. तुम तो सबके हो सकतॆ हो अब ढूंढो उनको जो #तुम्हारे है…..स्नेह 🍁🍁